मेहरानगढ़ का किला
यह किला जोधपुर के किलो में से एक है ओर इसे मेहरानगढ़ का किला कहते है मेहरानगढ़ के किले का निर्माण 1469 में राव जोधा ने करवाया था यह किला शहर से410 फिट की ऊचाई पर स्थित हैं ओर चारो तरफ से मोटी दीवार से घिरा है शहर से इस किले में आने के लिए घुमाउ दार रास्ते बनाये गए है जयपुर के सैनिकों द्वारा तोप के गोलों द्वारा स्पर्स झलकियां देखने को मिलती है इस किले के बाई तरफ किरव सिंग सोड़ा की छत्री है जिसने मेहरानगढ़ किले कि रक्छा करते हुए जान दे दी इस किले के कुल 7 दरवाजे है जो जिनमे से एक जयपाल जयपाल गेट का निर्माण राजा ने जयपुर ओर बीकानेर की जीत पर करवाया था फ्तेपाल गेट का निर्माण राजा ने मुगलो की हार के विजय में बनाया था किले पर पाए जाने वाले हतेली के निसान आज भी आकृष्ठ करता है इस किले का म्यूजियम राजस्थान के किलो में से एक है सिंहहासन के किले के एक साल बाद राव जोधा ने अपनी राजधानी को जोधपुर के सुरक्षित जगह पर लाने का फैसला किया क्योंकि उस के अनुसार हजारो साल पुराना जो मण्डोर था वो भरोसेमन्द स्थान नही था इसे के साथ मेवाड़ सेना को मण्डोर में ही दबा दियामेहरानगढ दुर्ग की नींव में ज्योतिषी गणपत दत्त के ज्योतिषीय परामर्श पर ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (तदनुसार, 12 मई 1459 ई) वार शनिवार को राजाराम मेघवाल को जीवित ही गाड़ दिया गया। राजाराम के सहर्ष किये हुए आत्म त्याग एवम स्वामी-भक्ति की एवज में राव जोधाजी राठोड़ ने उनके वंशजो को मेहरानगढ दुर्ग के पास सूरसागर में कुछ भूमि भी दी ( पट्टा सहित ), जो आज भी राजबाग के नाम से प्रसिद्ध हैं।मंडोर उद्यान का एक प्रमुख दर्शनीय स्थल है। राजस्थानी भाषा में साल का अर्थ कक्ष और दालान का अर्थ बरामदा है। अजीत पोल से प्रवेश करते ही एक लम्बा बरामदा दिखाई पड़ता है इसे ही देवताओं की साल व वीरों का दालान कहा जाता हैमन्डोर रावण की ससुराल होने की किदवन्ति भी है मगर रावण की पटरानी मन्दोद्री नाम से मिलता नाम के अलावा अन्य कोई साक्ष्य यहाँ उपलब्ध नहीं है। मन्डोर में सदियो से होली के दूसरे दिन राव का मेला लगता है। मेले के स्वरुप व परंपरा आज भी सेकडो साल पुरानी हे हाल के वर्षो में स्वरुप में जरुर बदलाव हुआ हे मगर प्राणपराओं में बदलाव नहीं हुआ है। मण्डोर का दुर्ग देवल, देवताओं की राल, जनाना, उद्यान, संग्रहालय, महल तथा अजीत पोल दर्शनीय स्थल हैं। मण्डोर साम्प्रदायिक सद्भाव एवं एकता का प्रतीक हैं। तनापीर की दरगाह, मकबरे, जैन मंदिर तथा वैष्णव मंदिर सभी का एक ही क्षेत्र में पाया जाना, इस तथ्य का मजबूत सबूत हैं कि विभिन्नता में एकता यहाँ के जीवन की प्रमुख विशेषता रही हैं।यह पड़िहार राजाओं का गढ़ था। सैकड़ों सालों तक यहां से पडिहार राजाओं ने सम्पूर्ण मारवाड़ पर अपना राज किया। सन् १३९५ में चुंडाजी राठोड की शादी पडिहार राजकुमारी से होने पर मंडोर उन्हे दहेज में मिला तब से परिहार राजाओं की इस प्राचीन राजधानी पर राठोड शासकों का राज हो गया। मन्डोर मारवाड की पुरानी राजधानी रही है।
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