jalore kila
जालोर का प्रसिद्ध सका 1331 ईस्वी में हुआ जब सुल्तान अलाउदीन ख़िलजी ने जालोर पर आक्रमण किया । जालोर के पराकर्मी शासक कान्हड़देव सोनगरा ओर उसके पुत्र वीरमदेव के त्याग और बलिदान तथा वीरांगना के जोहर की घटना ने इसे इतिहास में प्रसिद्वि दिलाई कवि पदमनाम कान्हड़देव प्रबन्द नामक ऐतिहासिक काव्य में इसका विशद वर्णन हुआ है। जालौर के चौहान तथा दिल्ली के सुल्तान जालोर के चौहान को भी दिल्ली के सुल्तान से बहुत संगर्ष करना पडां इस छोटे से राज्य ने राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की रणथम्भौर की भांति जालोर राज्य का अंत भी अलाउद्दीन के शासन में हुआ था कीर्तिपल ने जालोर के चौहान राज्य की स्थापना की थी। उसके उत्तराधीकरियो, समरसिंह तथा उदयसिंह सफलता पूर्वक जालोर राज्य का असिसत्वत बनाया रखा समरसिंह के समय दिल्ली में मुहम्मद गोरी का प्रतिनीधि कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गोरी के शासन की देख रेख कर रहा था उदयसिंह ओर दिल्ली के सुल्तान समरसिंह की मृत्यु के पश्चात1205 ई में उसका पुत्र उदयसिंह जालोर का राजा बना वह एक पराकर्मी तथा महत्वकांक्षी राजा था दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश उदयसिंह की बढ़ती हुई शक्ति से चितिंत था अतः उसने उदयसिंह की शक्ति का दमन किया 1228 मैं इल्तुतमिश ने जालोर पर आक्रमण किया और किले को घेर डाला उदयसिंह ने वीरता पूर्वक इल्तुतमिश की सेना का मुकाबला किया इल्तुतमिश ने जालोर के किले को जीतने के लिये भरपुर प्रयास किया, परन्तु उसे असफलता का मुंह देखना पड़ा । अतः उसने उदयसिंह के साथ संधी करना ही उचित समझा । मुस्लिम इतिहासकारो के अनुसार उदयसिंह द्वारा सुल्तान की अधीनता स्वीकार करने तथा 100 ऊँट 20 गोड़े भेट में देने के उपरांत इल्तुतमिश जालोर पर पूण अधिकार नहीं कर सका ओर उदयसिंह पूण रूप से सुल्तान के अधीन भी नही हुआ इस कि पुष्टि इस बात से होती है इस घटना के 5 वर्ष बाद इल्तुतमिश ने मेवाड़ पर आक्रमण कर गुजरात की ओर बढ़ने का प्रयास किया तो उदयसिंह ने मेवाड़ ओर गुजरात के साथ मिलकर इसकी प्रगति को रोकने का प्रयास किया ओर इल्तुतमिश को बाध्य होकर वापस दिल्ली लोटना पड़ा। राज्थानी वरतंत से ज्ञात होता है कि 1254 ई में नसरुद्दीन महमूद ने उदयसिंह पर आक्रमण किया , परन्तु मुस्लिम सेना को परास्त होकर वापस लौटना पड़ा ।। चाचिगदेव तथा दिल्ली के सुल्तान 1257 ई में उदयसिंह की मृत्यु के उसका पुत्र चचिदेव जालोर का राजा बना। वह दिल्ली सुल्तान नसरुद्दीन महमूद तथा बलबन का समकालीन था ओर उन दोनों के समय मे जालोर मुस्लिम आक्रमन से बचा रहा। सामन्तसिंह तथा दिल्ली के सुल्तान1282 ई चाचिगदेव की मृत के पस्चात उसका पुत्र समन्तसिंह जालौर की गद्दी पर बैठा। अलाउदीन खिलजी की प्रेरणा से 1291 जलालुद्दीन ख़िलजी की सेना साचोर तक बढ़ आई लेकिन सामंतसिंह ने भगेला राजा सारंगदेव की साहयता से मुस्लिम सेना को वापस लौटने को मजबूर किया 1296ई अलाउदीन ख़िलजी दिल्ली की गद्दी पर बैठा। वह एक समरजवादी तथा महत्वकांक्षी सुल्तान था वह सम्पूर्ण राजपूताने पर अदीप्तय करना चाहता था सामंतसिंह ने समय को पहचान कर अपने राज्य की बागडोर अपने युवा पुत्र कांडदेव को सौप दी । कांडदेव तथा अलाउदीन ख़िलजी कांडदेव समन्तदेव का पुत्र था वह उस समय जालोर की गद्दी पर बेठा था जबकि जालोर पर मुस्लिम आक्रमण का खतरा मंडरा रहा था उसने अलाऊदीन की समरजवादी नीति का मुकाबला किया उसके साहस पराक्रम कारण ही जालौर राजस्थान का एक ऐतिहासिक स्थान बन गया ।। अलाऊदीन खिलजी की समरजवादी भावना अलाऊदीन अत्यंत महत्वकांक्षी तथा समरजवादी शासक था वह सिकन्दर के भाती पूरे विश्व को सीखना चाहता था परन्तु दिल्ली के कोतवाल अलौलमुक की सलाह उसने पहले भारत को जीतने का निश्च्य किया इस अभिप्राय से उसने राजपूताने के स्वतंत्र राज्यों पर आधिपत्य स्थापित करने का निष्चय किया वह राजपूताने का सुदृढ़ किला जालौर पर अधिकार करना अत्यंत आवश्यक मानता था।। जालोर का सामरिक महत्व जालोर सामरिक द्रष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण राज्य था क्योंकि जालोर का किला अत्यंत मजबूत था अतः जालोर की स्वतंत्रता अलाऊदीन के लिये एक चुनोतियो बनी हुई थी इसके अलावा यहाँ से गुजरात तथा मालवा की ओर मार्ग जाते थे अतः गुजरात मालवा आदि पर अपना आधिपत्य बनाए रखने और दक्षिण भारत को जीतने के लिये जालोर पर अधिकार करना अत्यन्त आवश्यक मानता था।
Comments
Post a Comment